Tuesday, August 19, 2008
अपनी पत्नी को वो पैसे देकर गाँव वालों से मिलने चला गया उसके जाने के बाद मुखिया का दोस्त आया उसने मुखिया को दो सोने के सिक्के उधार दिए थे वो वापस मांगने आया था उसकी पत्नी ने दो सिक्के उस पोटली में से निकाल कर दे दिए कुछ देर बाद मुखिया घर आया और उसने संत को दिए हुए पैसे वाली पोटली निकला और गिनने लगा दो सोने के सिक्के कम थे उसे लगा संत ने उसके पैसे लिये हैं वो ततछन गाँव में जा कर सभी को संत के खिलाफ भरकाने लगा गाँव वालों ने मिलकर संत का अपमान किया तभी मुखिया की पत्नी स्नान कर के
लोटी उसने संत का अपमान होए हुए देखा उसने अपने पति से पूछा , मुखिया ने कहा तुम्हारे कहने पे संत के देख रेख में बीस सोने के सिक्के छोर गया था उसमे से दो सिक्के कम हैं इस संत ने चुरा लिया मुखिया की पत्नी ये सुनते ही रोने लगी और कहा एक बार मुझसे पूछ तो लेते वो जो दो सिक्के कम हैं वो मैं ने ही आपके दोस्त को दिए वो आपके जाने केबाद आए थे और अपने पैसे मांग रहे थे सो मैंने ही उसमे से दो सिक्के निकाल कर उनको दे दिया ये सुनकर गाँव वालों और मुखिया को बेहद दुःख हुआ वे संत के चरणों में गिर कर माफ़ी मांगने लगे संत ने दो मुट्ठी रेत लिया और कहा एक मुट्ठी रेत तुम्हारे दिए हुए मान सम्मान पर डालता हूँ दूसरी मुट्टी की रेत तुम्हारे अपमान पर डालता हूँ और ऐसा कह कर वो वंहा से चले गए
Sunday, August 10, 2008
Friday, March 7, 2008
तन मन्दिर की करी सफाई, कर आसन, प्राणायाम
मन में तेरी मूरत ध्याई प्रभु विराजो मम उर धाम
संत कहते हैं की ह्रदय में हरि का वास है. मूलाधार में माँ शक्ति एवं सस्त्रार में सदाशिव शम्भू विराजमान हैं. जहाँ प्रभु विराजें उस मन्दिर का ध्यान रखना हमारा पुनीत कर्त्तव्य है. शरीर के मध्यम द्वारा प्रभु का अनुभव करने के लिए आवश्यक है की हम शरीर का ठीक से ध्यान रखें.
भाग – १ : शरीर द्वारा साधना (ईश्वर भक्ति) के लिए योग की जो विधि महर्षि पतंजलि ने बताई है उसके आठ अंग हैं – यम्, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धरना, ध्यान एवं समाधि. पूज्य स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी कहते हैं की योग के इन दो अंगों यम् एवं नियम के द्वारा हम आत्मोत्थान के साथ साथ मुख्य रूप से परमार्थ का भी कार्य करते हैं. अतः अपने जीवन में यम् एवं नियम का अभ्यास अवश्य करना चाहिए.
यम् :
यम् का आशय अपनी वृत्तियों को धर्म में स्थिर रखने से है. ये पाँच हैं:
१. अहिंसा : मन, वचन एवं कर्म द्वारा किसी को किसी प्रकार से कष्ट न देना अहिंसा है.
२. सत्य : इन्द्रियों एवं मन द्वारा ग्राह्य बातों को यथानुरूप व्यक्त करना सत्य है.
३. अस्तेय : मन, वचन और कर्म से चोरी न करना, दूसरो की चीजों का लालच नहीं करना अस्तेय है.
४. ब्रह्मचर्य : मन समेत सभी इन्द्रियों द्वारा यौनिक सुच न करना ब्रह्मचर्य है.
५. अपरिग्रह : दूसरो की दी हुयी कोई भी चीज न लेना अपरिग्रह है.
Saturday, November 10, 2007
Hari kathaa
Geetaa Darshan
Monday, November 5, 2007
प्रार्थना
आलोकित पथ करो हमारा
हे जग के अंतर्यामी
शुभ प्रकाश दो, स्वच्छ दृष्टि दो
जड़ चेतन सब के स्वामी
तुच्छ हमारे मन के हे प्रभु
दुर्विचार सब दूर करो
प्रेरित हों हम केवल तुमसे
ऐसी हममे शक्ति भरो
तुम्ही बन्धु हो, तुम्ही पिता हो
तुम्ही मार्गदर्शक जीवन में
भक्ति और आलोक तुम्हारा
हम उतार लें निज तन मन में.
अगली शताब्दी का विषय ईश्वर और ईश्वर भक्ति है. चाहे यहूदी मार्ग से हो, इसाई मार्ग से हों, इस्लाम के मार्ग से हों या हिन्दू के मार्ग से हों, जिस रस्ते से भी हों – अब पारलौकिक बातों पर मन को लगाना होगा. बिना भक्ति को अपने जीवन का अंग बनाये मानव अपने कष्टों से मुक्त नही हो सकेगा. पर ध्यान रहे भक्ति कोई धर्म या संप्रदाय नही बन जाए.
भक्ति मात्र एक दर्शन नहीं है, कोई धर्म भी नही है, भक्ति एक ऐसा विज्ञान है जो व्यक्ति को आमूल परिवर्तित कर देता है. भक्ति उसकी विचारधारा को तथा वृत्तियों को रूपांतरित कर देती है. अगली शताब्दी भक्ति योग की है. केवल आम जनों के लिए ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक शोध कर्त्ताओं के लिए भी. जो वैज्ञानिक आज तथ्यों पर शोध करते हैं, वे सब अब भक्ति पर शोध करेंगे. भक्ति का मनुष्य के व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है, भक्ति का परम चेतना पर क्या प्रभाव पड़ता है, इन पर शोध होंगे.
भक्ति का सिर्फ पूजा पाठ से ही संबंध है ऐसा नही है. पूजा अपनी जगह पर है, कीजिए पर इतना जरुर जानिए कि भक्ति भावना का नाम है. भक्ति की पढ़ाई के लिए स्कूल मे जाने की या किताब पढ़ने की जरुरत नही है. केवल रास्ता बदलना पड़ता है. दुश्मनी, गुस्सा, वासना आदि के रास्ते पर जा रही भावना को भगवान की तरफ लगा दीजिये तो उसे भक्ति कहते हैं.